क्षेत्र-दरभंगा (बिहार)
शीर्षक-प्यारा बचपन
कहूं कहानी क्या
बचपन की ?
न भूल सकते हम
वो पल ज़िंदगी की ,
वो पल ज़िंदगी की ।
वो कित-कित का खेलना ,
संग सहेलियों के
झुलो पर झूलना ,
करता था मन हर्षित ,
हम सोच में बैठे है आज
क्यों न बचपन में ही है
अपना जीवन अर्पित ।
आम , अमरूद का वो चोरी करना ,
झुंड में सहेलियों के
होली दिवाली , ईद मनाते,
हम सब मिलकर के ।
गया कहां वो प्यारा बचपन ,
जब बित जाती थी राते
नानी-दादी की कहानी तले ।
मां के आंचल में
मिला था प्यार ,
अब हर रिश्ता हो गया व्यापार ,
अब हर रिश्ता हो गया व्यापार ।
त्योहार था हमारा मीठे पकवान से ,
आज दिया जाता ऑर्डर घर बैठे
दूर-दूर के संचार से ।
मीठे बोल कहां है अब
ज़िंदगी की बाज़ार में ,
जहां बरसते थे मधुर संबंध ,
घर-घर और बाज़ार में ।
कान तरसा करते थे
कौओ की आवाज़ के लिए ,
आ-जाए कोई अतिथि
पलक बिछाए बैठा करते
अतिथि सम्मान के लिए ।
आज कौन किसका इंतज़ार करता है ,
दूर-दूर से ही कर आंख-मिचौली ,
राम-राम कर जाता है ।
राम-राम कर जाता है ।
पलके आज भींग गई ,
याद कर अपना प्यारा बचपन ।
काश,रुक जाती उसी क्षण ,
संसार,समय और धड़कन ।
क्यों पहुंच जाता है उम्र ,
उस पड़ाव पर ,
जहां से कभी न लौटता
हमारा प्यारा बचपन ,
हमारा प्यारा बचपन ।
कुमारी आरती
दरभंगा , बिहार ।
2...good... Simply amazing thoughts..
ReplyDeletemesmerizing
ReplyDeleteAwesome
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