पता- जुगानी केम्प छत्तीसगढ़
मो- ९३४०४३३४८१
विधा- कविता
शीर्षक- डर
छोटे से बच्चे को देखो
आग को भी पकड़ना
चाहता है ।
बच्चें में कोई डर नहीं होती , इसलिए तो खुलकर जी पाता है ।
जीवन मीला है साठ सत्तर का मरने से क्या
डरना है ।
ध्यान से देखो सब ,झूठ
है जीसे तुमने माना है ।
मन तो मान्यता पर चलता है ,मन का कहां
कोई ठीकाना है ।
डर है कि खो न जाए
सुंदर काया गौर से देखो
ये हैं ,पंच तत्वों की माया
डर है कि खो न जाए रिश्ते नाते अरे जरा सोच
पगले ,सब अपने होते
हुए भी हम अकेले ही जातें ।
डर है कि ,मेरा प्यार मुझसे न रूठ जाये
डर से किसी न अब
तक कहा प्यार को
जान पाये ।
जो दिखता है प्यार जैसा
सब मृगतृष्णा ,का झूठा
ठीकाना है ।
तोड़ दो सब बंधन तुम्हें
बहुत दूर जाना है ,
सोने का पिंजरा है जगत
आगे सुंदर ठीकाना है ।
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