Sunday, March 29, 2020

छत्तीसगढ़ से स्वपन बोस की रचना- डर

श्री स्वपन बोस
पता- जुगानी केम्प छत्तीसगढ़ 
मो- ९३४०४३३४८१
विधा- कविता 
शीर्षक-  डर 


छोटे से बच्चे को देखो
आग को भी पकड़ना
चाहता है ।

बच्चें में कोई डर नहीं होती , इसलिए तो खुलकर जी पाता है ।

जीवन मीला है साठ सत्तर का मरने से क्या
डरना है ।

ध्यान से देखो सब ,झूठ
है जीसे तुमने माना है ।

मन तो मान्यता पर चलता है ,मन का कहां
कोई ठीकाना है ।

डर है कि खो न जाए
सुंदर काया गौर से देखो 
ये हैं ,पंच तत्वों की माया

डर है कि खो न जाए रिश्ते नाते अरे जरा सोच
पगले ,सब अपने होते
हुए भी  हम अकेले ही जातें  ।

डर है कि ,मेरा प्यार मुझसे न रूठ जाये
डर से किसी न अब 
तक कहा प्यार को
जान पाये ।

जो दिखता है प्यार जैसा
सब मृगतृष्णा ,का झूठा
ठीकाना है ।

तोड़ दो सब बंधन तुम्हें
बहुत दूर जाना है ,
सोने का पिंजरा है जगत
आगे सुंदर ठीकाना है ।

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