राज्य - राजस्थान
शीर्षक - पिताजी
संपर्क सूत्र - 9001019002
विधा - कविता
"पिताजी"
होली दीवाली हर त्योहार,
मांगते हैं जब हम उनसे उपहार।
हमें उपहारों से सजाने को ,
वो (पापा) चले है घर से दूर कमाने को ।।
दिन - रत अथक परिश्रम करके ,
जब वो घर को जाते हैं।
चन्द्र चांदनी संग संग वो भी
अपनों में खो जाते हैं।।
देख अकेलापन खुद का ,
वो हरपल टूट ही जाते हैं ।
रिश्ते नाते प्यार वफा सब
पीछे ही छूट जाते हैं।।
तुतलाती बिटिया की यादें
जब उनके मन में आती है ।
ऐसा लगता है जैसे
आंखों से वर्षा बहती है ।।
दशरथ - सा प्रेम बांटने
जब वो जीवन- समर में आते हैं।
कहत " सृजन" सृष्टि धारा में
तब वो "पिताजी" कहलाते हैं।।
सर्वाधिकार सुरक्षित - मौलिक रचना
Noce lines
ReplyDeleteGreat
ReplyDelete