राज्य-पश्चिम बंगाल
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शीर्षक-" कोशिश"
पानी-पानी रटते-रटते कितने प्यासे मरते हैं,
पत्थर के श्री गणेश जी मनों दूध पी जाते हैं ।
भूख से कितने बच्चे रोते और बिलखते हैं,
पत्थर की मूरत पे टनों फल चढ़ जाते हैं ।
कितनों के घर चूल्हा नहीं जल पाता है,
हवन कुंड में मनों जौ तिल स्वाहा हो जाता हैं ।
भूख से कितने गरीब बिन खाये मर जाते हैं,
रखने के अभाव में टनों गेहूँ सड़ जाते हैं।
दुःखता है सर किसी का तेल के अभाव में,
पर शनि महाराज तेल से ही नहाते हैं।
रहती है उपवास बीवी पति की याद में,
प्रेमिका के साथ पति गुलछर्रे उड़ाते हैं।
लोग पत्नी की याद में आकंठ डूब जाते हैं,
तब माँ-बाप को सहज में ही भूल जाते हैं।
स्वार्थ जब लोगों के ऊपर हावी हो जाता है,
रिश्ते-नाते लाज-शरम सब छोड़ देते हैं।
भाग्य भरोसे बैठे रह सदा पछताते रहते हैं,
कर्म करने वाले जीव सदा मुस्कुराते रहते हैं।
करते हैं जो कद्र समय की वो आगे बढ़ते जाते हैं,
"दीनेश" कोशिश कर के लोग पर्वत पर चढ़ जाते हैं।
दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश" कलकत्ता
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