राज्य- दरभंगा, बिहार
शीर्षक- राही
*राही*
पथ के राही
चले बेफिक्र
मंजिले दूर हो
रास्ते कठिन हो
पथरीली डगर हो
काँटे बिछे हो
चलना है बस
चलते जाना
रुकना नही है
मेरा काम
मै हूँ पथ का
अडिग वो राही
मै हूँ पथ का
निर्भय राही
चला हूँ पथ पर
बढ़ने हेतु
जीवन मे कुछ
करने हेतु
मै हूँ पथ का
ऐसा राही
जले ना जो
सुर्य की तपन से
थके ना जो
राह के थकन से
मै हूँ ऐसा राही
*कंचन प्रभा*
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