पद, शिक्षिका।
स्थान, मध्यप्रदेश।
शीर्षक, गम।
बहुत मना किया, मै तुम्हें नही चाहती।
जिंदगी, मे खुशिया ही मेरी चहेती।
मै सुख से प्रेम करती, उसकी ही रहुंगी।
दूर रहो मुझसे, मे दूरी तुमसे करती।
नही माना गम, रोज आने लगा।
मना करने के बाद भी मुझे, सताने लगा।
रोज रोज आकर बैठ वह जाता है।
देख देख ऊसे मेरा मन भर आता है।
कह.रही सुंदर.कितना प्यारा चहरा है।
क्यो आकर तुम ईसे खराब करते हो।
कहने लगा, यह मेरा है, मै ही इसका हूँ।
मुझसे ही तुम रहो, यही मै चाहता हूँ।
हाथ जोड विनती की, मुझसे दूर चले जाओ।
देखो मुडकर भी मत देखना, एसे ना आओ।
नही माना वह ,मेरे पीछे ही पड गया।
एक एक सांस मे जैसे वह बस गया।
दुनिया कहां प्यार करने वालो को मानती है।
गम इसका साथी है, कह छोड जाती है।
थक गई, बहुत, कुछ नही सुझ रहा।
वह बैठे बैठे, कितना मुस्कुरा रहा।
बोला, बात मान लो, मुझे, जीवन मे ले लो।
चाहे तुम नही चाहो, मेरा कहा मान लो।
जबरन ही उसने मेरे दिल को तोडकर।
अपना हाथ बढा मेरे पास आ गया।
पूरे जग से दूर कर मेरे संग रहने लगा।
और देखते ही देखते, मुझमे मिलने लगा।
हार कर मै भी कुछ ना कर सकी।
आज गम से शादी कर घर अपना बसा सकी।
श्रीमती ममतावैरागी तिरला धार
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