शीर्षक - मेरी देश की बीमारी ,
पता - ग्राम धोबनपुरी , बालोद छत्तीसगढ़
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कुछ अल्फ़ाज निकले हैं दिल से,
जनता की पुकार निकले हैं मुश्किल से
लहू मे जोश आँखो में अंगारे हैं,
ए वतन हम तेरे ही सहारे हैं।
जिसकी गाथायें थी सदियों पुरानी जहाँ की शान थी हर एक नारी,
पर एक समय ऐसा आया
जब वतन को दीमक सम खा गई भ्रष्टाचारी,
जिसकी जड़ है प्रत्येक अधिकारी,
ऐसी है मेरे देश की बीमारी ।
तम्हें कहूँ या खुद से कहूँ
या फिर इस जहाँ से कहूँ,
कार्यालय मे बैठे पटवारी से कहूँ
या संसद भवन मे बैठे अधिकारी से कहूँ,
जिसके इतिहास मे थी वीरों की कहानी,
सलाम करती जिसे ये दुनिया सारी,
पैर से सर तक लुट गई बेचारी
कश्मीर से कन्याकुमारी तक हुई अनाड़ी,
इतनी गम्भीर है मेरे देश की बीमारी ।
कब आयेगा वो दिन
जब इसकी मिट्टी मे सुगंध फिर से बिखरेगा,
कब आयेगी वो सुबह
जब ईमानदारी का चमकता सूरज फिर से दिखेगा,
कब कहेंगे हम
ए वतन तुझपे दिल कुर्बान है
तू ही तो मेरी आन-बान-शान है,
कब आयेगी उस चमकते सूरज की सवारी,
जिस दिन जलेगा दीपक,जैसे हो दिवाली
तब पूरी होगी ये तमन्ना हमारी
जब दूर होगी मेरे देश की बीमारी।
-_Hulsi sahu_-
Awesome hulsi
ReplyDeleteTabbahi yaar
ReplyDeletenice hulsi
ReplyDeletenice
ReplyDeleteएक अल्फाज निकले हैं दिल से,..…...
ReplyDeleteशीर्षक मेरे देश की बीमारी होना चाहिए हुलसी जी
ReplyDeleteरचना बहुत बढ़िया है बधाई