शीर्षक-आँखें
राज्य -छत्तीसगढ़
°●°°●°°●°आँखे °●°°●°°●°
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झील सी लोचन,कमल पर दांव
लगाती तुम्हारी आँखें,
अपलक,निहारती सकुचाती
और लरजती तुम्हारी आंखे।
जीवन के प्रथम स्पंदन में
खुली तुम्हारी आँखें,
जीवन -सांझ में हुई शिकार
खग्रास के तुम्हारी आँखें।
गम हो चाहे खुशी हो,नेह से
भरी रहती है तुम्हारी आँखें,
नशीली,शर्मीली मनुहार में
डूबी तुम्हारी आंखें।
सुरमई निगाहें जब झुके तो
कत्ले आम मचाती तुम्हारीआँखें
मन हो हताश,निराश गंग ,
जमुन धार बहाती तुम्हारी आँखें।
हवस के भूखे दरिंदे के लिए
आक्रोश की ज्वाला भड़काती तुम्हारी आँखें,
ममत्व समेटी, प्रीत भरी सबको लुभाती रतनारी ऑंखें।
अजब सी प्यास,अजब सीआस,
उम्मीदों के किरण झिलमिलाती आँखें।
हर विधाओं में तुम्हारा ही कथन,
मैं कर नहीं सकती तुम्हारा वर्णन।
मौन रहकर भी बहुत कुछ
बोलती तुम्हारी आँखें,
झील सी लोचन,कमल पर दांव
लगाती तुम्हारी आंखें।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर (छ. ग.)
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