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शीर्षक - चुनाव
चुनाव
चुनाव का माहौल गावो में हर कहीं छाया है ,
पांच साल बाद फिर मुखिया चुनने का अवसर आया है,
फिर वही प्रलोभन है ,फिर वही वादें हैं ,
गांव को स्वर्ग बनाने ,सभी के इरादें हैं ,
साड़ी , कम्बल ,पायल न जाने क्या - क्या बाटें जाते हैं ,
जिसके बलबूते उम्मीदवार सत्ता में आतें हैं ,
चुनाव , जिसमें घरों में मदिरा बहा करती है ,
बदले में फिर पाँच साल जनता सहा करती है ,
चुनाव पश्चात बदल जाता है विजेता, जातिगत , दलगत ,
भूल जाता है विकास ,फंस जाता है मोह वश , पद गत ,
सिमट जाता है क्यूं दायरा अपने और गैरों में ,
क्यूं जनता को लाना चाहता है अपने पैरों में ,
फिर छोटे -बड़े कामो में , उनका अलग हिस्सा है ,
ये तेरा - मेरा नही , गांव -गांव का किस्सा है ,
अपने -पराये , करीब का , देखा जाता है ,
रुपयों बिन किसी का काम पूरा न हो पाता है ,
जो अच्छे उम्मीदवार होतें हैं,
जो तटस्थ बने रहतें हैं ,
जिन्हें एक ओर तारीफ तो मिलती है पर वोट नही ,
क्योंकि उसने चरित्र दिखाया होता है , नोट नही ,
सिमटी दायरों से अच्छा तो वो चुनाव का दौर होता है ,
जिसमें सभी अपने होते हैं ,हर घर उनका (प्रत्याशी ) ठौर होता है ,
काश सभी ऐसे ही बटकर भी न बटें होते ,
चुनाव का सा माहौल होता ,कोई किसी से न कटें होते ,
फिर पंच परमेश्वर ही होते , उनका अस्तित्व बरकरार रहता ,
कानून के झमेले न होते ,
हर कोई अपनी बात बेबाक कहता ,
- शैलेन्द्र चेलक -
Bahut Khoob
ReplyDeleteThanks
ReplyDeleteगजब
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