शीर्षक:- *तकलीफ़*
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
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*तकलीफ़*
क्यों किसीके दिन उदास,
और रातें बेरुख़ी सी होती है...
एक छत के निचे रहकर भी,
लोग तनहा ज़िंदगी जीते है ...
रोज़ाना आँखों के सामनेसे गुज़रते
कई चेहरे अंजाने से लगते रहते है ..
नज़रें शायद कुछ बोलती है लेकीन,
ओठोंपर लफ़्ज़ क़ैद होकर रह जाते है ...
गर रुह और जिस्मों को बिखरना ही है
तो टकराकर क्यों बिखर नही जाते है...
उम्र का कारंवा युहीं गुजर जाता है ,
मनमे सवालों के गुबार उठें रहते है ...
युहीं गुज़र जाती है ज़िंदगी बेमानी सी ..
क्यों ख़ुशियों का समा नही बाँधा जाता है ...
# संजय वासनिक “ वासु”
कवी कधीपासून झाला
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना
Khup Sundar...
ReplyDeleteWow!
ReplyDeleteछान
ReplyDeleteBadhiya
ReplyDeleteZakas
ReplyDeleteBahut badhiya
ReplyDeleteKhupch Chan Kavita
DeleteWawawa very gud sir...
ReplyDeleteMast Kavita
ReplyDeleteBahut sundar kavita
ReplyDeletenice sir
ReplyDeleteशायद इसी का नाम जिंदगी है। अति सुंदर रचना।
ReplyDeleteअति सुंदर कविता
ReplyDeleteअति सुंदर कविता ।
ReplyDeleteNice poem.
ReplyDeleteNice poem.
ReplyDeleteFrom sk tyagi
Kya bat Hai. Khup chan
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