शीर्षक-गणतंत्र
राज्य-छत्तीसगढ़
गणतंत्र दिवस की झांकी कहती
आजादी अभी अधूरी है।
कुछ अशिक्षा के कारण और कुछ गरीबी की मजबूरी है।
गांव में बच्चे भूखे हैं, झूठे वादे निभाये जाते हैं।
नारी सशक्तीकरण की बात कहां
घूंघट में मुखड़ा ढापे हैं।
कुछ अज्ञानता का दौर चला कुछ
रुढ़ियों की मजबूरी है।
कहीं नगरीकरण में पेंड़ कटे कहीं
लिंग भेद की छूरी है।
इसीलिए बेटा-बेटी में आज भी कितनी दूरी है।
नन्हें बच्चों छीन जब खुशी मनाई जाती है।
कुपोषित हो लंगड़ा समाज बैसाखी ले चल पाता है।
कागज पर बनते रोड़ डेम जो जनतंत्र कहलाता है।
आओ मिलकर शपथ ले ऐसा गणतंत्र दिवस मनायेंगे।
भूखे को रोटी अनपढ़ को शिक्षा
गांवों को गढ़ जायेंगे।
आसमां पर भारत का तिरंगा शान से फहराएंगे।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर
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