राज्य-चंडीगढ़
विषय-तन्हाई
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रात ने तन्हाई की चादर ओढ़ी
चाँद दुबककर रह गया
उसकी चाँदनी छिटक पड़ी
चहुँ ओर
उसने रात पे पहरा लगा दिया।
रात खामोश थी, उदास थी
उसे इंतज़ार था उस शमा का
जो शायद आने वाली थी
उसकी तन्हाई हरने
जिसने चाँद को अपनी आगोश
में ले लिया।
चाँद भी धीरे-धीरे समाने लगा
बादल की बाहों में
बादल भी क्या मस्त थे!!
घूम रहे थे यहां-वहां
आसमा को अपनी दुल्हन बनाके
झूम रहे थे बांधे समा।
आसमा का अंदाज़ देखो
मानो शर्म से हुई छुई-मुई
रात के आगोश में चाँद को देखकर--------
खुद मानो तन्हा सी ही रह गई।
चहुँ ओर खुशबू बिखर पड़ी
उस रात की रानी से
मानो इत्र में नहाकर वो
आई हो रात की तन्हाई मिटाने।
झींगुर भी कहीं दूर से
सन्नाटे को चीर रहे थे
रात को चंचल बनाने
चांदनी में भीग रहे थे
तन्हाई का ऐसा आलम
छाया था चहुँ ओर
रात भी बेतहाशा सा हो
सोच रहा था-"कब होगी भोर"?
दिल की छूने वाली, निशा का सुंदर वर्णन। लिखती रहो-रुके न क़लम, हो आपका यही करम। शुभ कामनाएँ।
ReplyDelete(एक प्रशंसक- किशन नेगी एकान्त)
बहुत खूब❤️
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