शीर्षक- शिक्षा
चलो सब शिक्षित हो जाए।
आज हम दीक्षित हो आए।
कहने भर से नही कोई पढा है।
प्रेम का बंधन कहाँ बाधा है।
शिक्षा ज्ञान सबमे भर देती।
सुंगधित कर वह महका देती।
जीवन नदियो सा अमृत जल होता।
और मानव आज हंस कर रहता।
नही लडाई झगडा होता।
और ना दूजो की रोटिया छिनता।
नर कहलाते, शान भी दिखाते।
पर वाणी से मीठे बोल ना पाते।
गुगें बहरे से सब रहते.है।
क्रोध.मे घायल यह करते.है।
शासन, सत्ता, धन पाने को
दिन रात कुचक्र भी रचते।
सब अपने ही भाई बंधू है।
फिर भी तानते उनपर बंदूक हैः
क्या क्या कर रहे देखो तुम सब।
कहाँ महाभारत से कुछ सीखा है।
आज भी दूशासन बैठा भुखा है।
द्रोपदी आज भी चिल्लाती मिलती।
चीरहरण तो रोज.होता है।
कहते हम आधुनिक ठहरे।।
और रहां विज्ञान चलता है।
तरह तरह के आविष्कार करके।
मानव खूद पुतले सा बनके।
देखो इतराने यह.लगा हैं।
पर असली इंसानियत कहां है।
श्री मती ममतावैरागी तिरला धार
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