रायपुर, छत्तीसगढ़
ख़्याल
कई दिनों से कोई ख्याल आ रहा कहने को,
शब्द बने ही नहीं जो बयाँ करने को...
पास होते होते दूर कैसे हो गये,
फासले कम नहीं दरमियाँ कहने को...
लम्हें पलकों पर ओस बन के काटे हैं,
हम रह गए बस मुंतजिर कहने को...
ज़ायका जो आँखें में नजर आता था,
अब नहीं वो नज़रें बयां करने को...
हज़ारो समझाइशों ने दिल को अब खामोश किया,
तेरा तगाफ्फुल अश्कों में अयां करने को...
रश्मि...
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