राज्य - चंडीगढ़
विषय- स्मरण
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यूँ बैठे-बैठे अचानक ही
स्मरण हो आया गुज़रा कल।
कितने प्यारे, कितने सुंदर
थे वो लम्हे, थे वो पल।
आँख मूंद कर बैठ गई
औ मन के तारों को छेड़ा
अगणित सुर झंकृत हो गए
छंट गया मन का अंधेरा।
मन के दरवाज़े पर फिर
यादों ने दस्तक दी।
देखा उस दरवाज़े पर तो
यादें बचपन की खड़ी।
कितना प्यारा सा बचपन था
कितनी उमंगों से था भरा
दौड़ती-भागती ज़िन्दगी थी
दुःख का छींटा भी वहाँ ना था।
आज भी स्मरण हो आता है
विद्यालय के वो दिन-------
जहाँ मेरे मित्र औ सखियाँ मिल
चहकते थे नितदिन।
माँ का वो पकवान बनाना
त्योहारों पर बाहर घुमाना
होली, दीवाली के दिन मिलकर
घर सजाना, खुशियाँ मनाना।
ये सब स्मरण हो आते ही
मन बाग-बाग हो जाता है
जीवन मानो फिर से इक बार
जीने का बहाना पाता है।
सच है बीते कल में जाकर
दिल झूम-झूम फिर जाता है
कर के स्मरण वो मीठे से पल
दुःख मानो छंट ही जाता है।
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