शीर्षक-मानवता का पानी
राज्य-छत्तीसगढ
नदियों का पानी अब
सूख गया है,
रेत को सपने में भी
नहीं दिखता
बहता हुआ पानी।
आंखों का पानी अब
सूख गया है,
हकीकत में नहीं दिखता
आखों से बहता पानी।
चेहरों का पानी अब
सूख गया है।
खुरदुरे चेहरे पर
नहीं दिखता
चमकते चेहरे का पानी।
बादलों का पानी अब
सूख गया है।
रिमझिम करता
नहीं गिरता
बरसात का पानी।
झरनों का पानी अब
सूख गया है,
झर-झर करता
नहीं बहता
झरने का पानी।
इंसानियत का पानी अब
सूख गया है,
नहीं दिखता कहीं पर
प्रेम बरसाता
मानवता का पानी।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर
No comments:
Post a Comment