रचनाकार- पवन गौतम बृजराही बमूलिया
सम्पर्क-91164885
शीर्षक--प्यास
*गीत-प्यास*
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प्यासा सावन प्यासा जीवन
प्यासी पनघट गगरी है।
प्यासी धड़कन प्यासी साँसे..
प्यासी मन की नगरी है !!
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प्यास पपीहा गीत सुनाए ।
प्यासी नदियाँ शोर मचाए।।
झरने सरवर सब प्यासे है ।
प्यासी मंजिल डगरी है ।।
प्यासी धड़कन प्यासी साँसे..
प्यासी मन की मगरी है !!
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प्सास प्यास ही होती है!
चाहे पनघट कैसा भी हो।।
रास रास ही होती है ।
चाहे जमघट कैसा भी हो।।
मरघट कोई लाश लाश है।
गुजरा जीवन ह्रास ह्रास है।।
उधर समन्दर शोर मचाये।
प्यास उसे भी लग रही है।।
प्यासी धड़कन प्यासी साँसे..
प्यासी मन की नगरी है।।
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मीराँ की थी प्यास निराली
दौडी कृष्ण समा बैठी।
और कबीर की कितनी प्यारी
प्यासी साखी तन ऐंठी।।
यीशु को जीवन प्यास लगी थी।
बुद्धा को कुछ खाश जगी थी।।
अपनी अपनी प्यासें सबकी ।
कुछ दिव्य अलोकिक जगरी है।।
प्यासी धड़कन प्यासी साँसे..
प्यासी मन की नगरी है।।
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चन्दा सूरज तारे सबको
प्यास ने खूब भगाया है।
आसमान के आँगन में
फिर सबने शोर मचाया है।।
मुझे प्यास है तुझे प्यास है।
राह कठिन है मगर आस है।।
धधक धधक धड़के अवनि।
क्यों सीने धधके सिगरी है।।
प्सासी धड़कन प्यासी साँसें..
प्यासी मन की नगरी है।।
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चिर बिन्दु से क्षितिज तलक हाँ
अजब प्यास का मंजर है।
व्यष्टि समष्टि यहाँ वहाँ क्यों
प्यासामय इक लंगर है।।
मन्दिर प्यासे मस्जिद प्सासी।
देख गजब आवत है हाँसी ।।
बादल प्यासा बारिश प्यासी ।
खुद मयखाना मगरी है।।
प्यासी धड़कन प्सासी साँसे..
प्यासी मन की नगरी है।।
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पवन गौतम बृजराही बमूलिया
बहुत उत्कृष्ठ रचना।
ReplyDeleteप्यास बुझती नहीं,नदिया के पास जाने से।
सिमटती है प्यास,मन में दरिया बनाने से।। (डॉ शिव लहरी)