Tuesday, December 17, 2019

छत्तीसगढ़ से नलिनी बाजपेयी की रचना -महंगाई की मार

नाम-नलिनी बाजपेयी  
शीर्षक -महंगाई की मार 
राज्य-  छत्तीसगढ़                                

  महंगाई की मार  

महंगाई की मार 
मुझे रास न आई,
अब तो तू छोड़ दे 
अपनी बेहयाई ।

सिसकता बचपन,
जवानी में बुढापा छाई,
धसे गाल,रुई हुए बाल, 
आनन में आई ना ललाई।

महंगाई की मार झेलता
 बेबस उदास है तरुणाई,
अच्छे दिनों की उम्मीद में
 आने लगी रुलाई।

पत्थर बनी,सुरसा सी बढ़ी,
मोम ना बन पाई,
राशन महंगी,स्वास्थ्य शिक्षा 
महंगी प्याज ने आग लगाई।

बढ़ती कीमत,आसमन छूती 
अंगद का पैर बनी महंगाई,
पेट में चूहे कुदे मन 
भाने,
लायक चीज न खाई।

खाएं क्या पहने क्या
 महंगी हो गई सिलाई,
घूसखोरी,जमाखोरी ने
 सबकी होश उड़ाई।

भूखे पेट सो रहा बच्चा
 मां का मन घबराई,
उम्र बढ़ती,अनब्याही बिटिया ,
देख नींद ना आई।

बूढ़ा बाप सोचता मेरे आंगन 
कब बजेगी शहनाई,
महंगाई के दौर में रिश्ते हुए सस्ते,
होने लगी लड़ाई।

बेटा बाप का भाई का भाई नहीं ,
संबंधों की सूखने लगी अमराई,
महंगाई अपने साथ 
भ्र्ष्टाचार को भी ले आई।

मिले गर वो तो गाढ़ जमीन में ,
बताती उसे हरजाई,
राष्ट्र-प्रेमऔर विकास की  
ऐसे में कब होगी भरपाई।

महंगाई की मार
 मुझे रास ना आई,
अब तो तू छोड़ दे बेहयाई।

    नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर( छ. ग.)

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