Monday, December 30, 2019

छत्तीसगढ़ से विजिया गुप्ता "समिधा" की रचना- ओस की बूँद

नाम- विजिया गुप्ता "समिधा"
क्षेत्र- दुर्ग- छत्तीसगढ़
विषय - *ओस की बूँद*
विधा-  कविता

ओस की नाज़ुक बूँदों से,
कुछ सीखो और सिखाओ।
पल दो पल का जीवन है,
सबको खुशियाँ दे जाओ।

समय चक्र बलवान बड़ा है,
इक दिन मिट्टी में मिल जाना है।
या ओस की बूँदों जैसे,
वाष्पित हो उड़ जाना है।
लेकिन उससे पहले यारों,
कुछ तो सार्थक कर जाओ,
ओस की नाजुक......

पैरों के नीचे दबकर भी जो,
स्फूर्ति और शीतलता दे।
खुद का अस्तित्व मिटाकर भी,
जो औरों का सन्ताप हरे।
परोपकार का ऐसा ही,
आलम्बन तुम भी बन जाओ।
ओस की नाजुक ....

मत सोचो तुम कल क्या होगा,
कर्मशील बन डटे रहो।
खुद मिटकर सबकी रक्षा करे जो,
उस सैनिक सम तुम अड़े रहो।
क्रूर काल जब द्वार खड़ा हो,
खुद को मोती सा चमकाओ।
ओस की नाजुक......

रवि किरणों से नज़र मिला कर
हीरे सी जो चमक उठे।
नन्ही क्षणभंगुर होकर भी,
जिसका स्वतन्त्र अस्तित्व बने।
ऐसे ही अपने वजूद को,
तुम सब भी निखराओ।
ओस की नाजुक.....

अपना व्यक्तित्व सँवार चलें,
अपनी स्वतन्त्र पहचान बनें।
जिसके साथ खड़े हो जाएं,
उसका भी सम्मान बढ़े।
अंको में जुड़ पाओ गर तो,
शून्य सदृश्य गुणित हो जाओ।
ओस की नाजुक....
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विजिया गुप्ता "समिधा"
दुर्ग-छत्तीसगढ़

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