समस्तीपुर बिहार
मो-7250087926
शीर्षक:- नारी
तुम्हीं हो जग उद्धारक नारी,
तुम्हीं हो जग संघारक काली।
कहीं ममता श्रृंगार प्रेम की,
सुनो हे जननी सखी प्यारी।
तेरी रूप है बहुतेरे,
सीता सावित्री अति धनेरे।
कहीं पत्नी बन प्रेम विखेरे,
तो कहीं दिखें ममता तेरे।
कहीं कमल की कली बनकर,
पुरुषों को अति लुभाया है।
तो कहीं सीता बनकर तुमने,
लंका में विध्वंस मचाया है।
जब प्रेम पत्र लिखी तो,
संसार सजी श्रृंगार से।
जब काली बनकर आयी तो,
शीश कटा करवाल से।
कहे निकेश हे नारी तेरी,
है अजब रूप बहुतेरे।
कहीं खिले हैं श्रृंगार सुमन,
कहीं ममता के मेले।
निकेश सिंह निक्की
अच्छी रचना nikesh जी
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