Monday, December 16, 2019

चंडीगढ़ से शकुन्तला की रचना- पिता

नाम - शकुन्तला
राज्य - चंडीगढ़
विषय - पिता ( पापा )

विषय- पिता
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वो फ्रॉक पहनकर कूदना-फाँदना
कभी पेड़ पे चढ़ना, तो कभी
इमली खाना-------
कभी तितली के पीछे तितली
                           बन जाना
कभी मित्रों के संग खेलना, दौड़ना
ये सब अब नहीं कर पाती पापा
क्यों नहीं इठला पाती पापा?
क्या इसको ही बड़ा होना कहते हैं??????
क्या मैं बड़ी हो गई हूँ पापा?
मम्मी का वो मुझे डाँटना
"चुप बैठो!अब तुम बच्ची नहीं हो
क्यों इतना चिल्लाती हो तुम
बात-बात पर उछल कूद कर
घर को सिर पे उठाती हो तुम!"
क्यों माँ ऐसा कहती है मुझको
पापा, क्या ये पता नहीं है उसको
कि मैं तेरी लाडली बेटी
अभी भी तो हूँ मैं छोटी सी
कभी दौड़ तेरी गोदी चढ़ जाऊं
तेरी गोद से माँ को खूब चिड़ाऊं
पर पापा, नहीं कर पाती ये सब
चाह कर भी दब जाती हसरत
पापा मुझे बताओ ना!!!
क्या मैं सचमुच बड़ी हो गई हूँ?
अब नहीं रहे वो खेल खिलौने
कहाँ खो गए सपने सलोने?
वक़्त के पीछे भागना अब तो
छोड़ दिया है मैंने
वक़्त का हाथ पकड़ कर चलना
सीख लिया है मैंने!
पापा, तेरी लाडली अब फ्रॉक 
                          नहीं पहनती।
गुड़ियों के संग खेल के उनका
ब्याह नहीं रचाती।
नहीं भागती तितली को पकड़ने
व्यस्त हो गई वक़्त से लड़ने
पापा, उसने बुन लिया है
जीवन का ताना-बाना
पापा अपनी गुड़िया से मिलने
एक बार तो आना-----
पापा, लौट के फिर आ जाना।

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