राज्य-छत्तीसगढ़
कविता का शीर्षक-बेटियां
बेटियां हैं तो जीवन में रौशनी है नूर है
बेटियों से ही घर-आंगन में खुशियां भरपूर है
बेटी है तो अमराई में,झूले की डोर है
बेटी से ही गलियों में, शरारत का शोर है
बेटियों से ही मंदिर में पूजा की थाली है
बेटी से ही तो राखी, होली, दीवाली है
बेटी की पायलों से, आंगन में झंकार है
बेटियों से बाबुल की, बगिया में बहार है
दियों में उजाला है, रंगोली में रंग है
बेटियों से ही तो,तो त्यौहारों की उमंग है
बेटियां नहीं तो घर लागे,कोई शमशान है
नन्ही-नन्ही बेटियों से तो, घर गुलिस्तान है
फिर किसलिए बेटी का सम्मान नही है
महफूज़ क्यों बेटियों की जान नही है
क्यों बेटियां बनीं हवस का सामान हैं
क्यों आज उनकी अस्मत लहुलुहान है
जो वक्त से ही पहले,चिता पर लेटी थी
सिर्फ़ जिस्म नही थी,वो किसी की बेटी थी
चिता से सदा आती है, हालात संभालो
ख़तरे में जो भी बेटियां हैं, उनको बचा लो
धरती कहीं बेटियों से,हो जाए ना ख़ाली
चमन तेरा उजड़ रहा, बचा इसे माली
बेटी से है अस्तित्व, इस धरा का,गगन का
बेटी से ऱंगो-नूर है,हर घर के चमन का
बेटी ही शंख शान्ति का, बेटी जेहाद है
हर पिता को ये भगवान का,इक आशीर्वाद है
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