Laxmi Nagar
Delhi
एक लम्बे अर्शे से इसको हम पहचानने में लगे हैं ,
मतलबी दुनियाँ है इसमे अब ढल जाने में लगे हैं |
एक फूल था कभी,और आज हुआ हूँ पत्थर ,
मगर फिर भी लोग मुझे यार आजमाने में लगे हैं |
उठ सकता हूँ आज मैं भी ऊपर काबिलियत से अपनी,
लेकिन मेरे अपने ही मुझे बड़ी शिद्दत से गिराने में लगे हैं
देखो तो जो लोग मुझसे भी बुरे हैं इस दुनियाँ में ,
अब वही लोग मुझको आइना दिखाने में लगे हैं |
खुदा का शुक्र है कि तालिब -ए -इल्म हूँ मैं ,
कितने शातिर हैं लोग यहाँ मुझे मिटाने में लगे हैं |
तालिब मंसूरी
Laxmi Nagar
Delhi
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