शीर्षक-महिला मजदूर
राज्य-छत्तीसगढ़
कभी बस्तर की कंदराओं में
तो कभी बस्तर की घनी
झुरमुट में अपने नन्हें बच्चे को
बगल में बांधे मैले कुचैले
आंचल में ममत्व समेटे हुए
पौ फटने के पूर्व निकल
पड़ती है वह मीलों दूर।
तीखूर,फूटु ,सरई, इमली की
तलाश में हर दिन जंगली
जानवरों की खौफ तो कभी
ज़हरीले सांपों का डर।
बरसात की झड़ी कड़कड़ाती
ठंड व ग्रीष्म की तपिश में भी
उसके चेहरे की चमक
नन्हें शिशु के लिए सपने
बुनती वह कभी काटती लकड़ी
कभी शहद की तलाश में
मधुमक्खियों का शिकार हो जाती
भरी बरसात में उफ तक न करती
नाली निर्माण कार्य में बच्चे को
खुमरी ओढ़ा काम करती।
चटनी व बासी उसके लिए
अमृत से कम नहीं। बच्चे की चीख सुन वह सिहर जाती।
तुमडे से पानी निकाल बच्चे को
पिलाती फिर काम में लग जाती।
ठंड में पैरे का गद्दा बनाती,
नन्हें शिशु को ठंड से बचाती।
वह हर पल मुस्कुराती
परेशानियों का बादल हटाती।
इरादों से मजबूत वह साहसी
महिला मजदूर।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर
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