रचनाकार-- पवन गौतम बृजराही बमूलिया
विषय व शीर्षक
नई उमीदें नया आसमां
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ग़ज़ल
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नई उम्मीदें नया आसमां क्या कहना।
लग रहा है स्वप्निल जहां क्या कहना।
उमर की साख पे बैठे लगाए आशा को ,
चमन में रहगुजर है बागबां क्या कहना।
ज़ालिम ने जलाया था सिर्फ़ पड़ोसी का घर,
जला फिर उसका भी मकां क्या कहना।
जो समन्दर को गए थे फिर भी हँसते थे,
गए ना दरिया तक फिर भी थकां क्या कहना।
रो रो के दुआ करतें हैअब मुझको बचाने की वो,
डुबाकर पहले दरिया दरमियां क्या कहना।
खुदा का फैसला अब पल भर में होता है,
ऑनलाइन है उसका फ़रमां क्या कहना।
पवन जब खुशबुओं का कोई दीवाना नही दिखता,
फिर क्यों जलाए रखता है दिलोजां क्या कहना।
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पवन गौतम बृजराही बमूलिया
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