राज्य- दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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शीर्षक- हुंकार
*****हुंकार*****
देखो कैसी करूण दशा है मेरे भारत देश में।
खुले आम कर रहे हरण हैं दुःशासन परिवेश में।
कैसे इनको लाड़ नहीं है पुत्री, वधु, वनिता पर।
कैसे कालिख लगाते हैं ये पावन, सरस, पुनीता पर।
इस पर इनको भ्रम है कि ये साक्ष्य मिटा ले जाएँगे।
पहले लूटी इज्जत, जान अब न्याय मिटा ले जाएँगे।
क्यूँ दिल नहीं पिघला जब वो सिसक सिसक के रोई थी।
कैसे पाया सुकून जब वो मौत की गोद में सोई थी।
जिसे असर नहीं यहाँ किसी की चीख, पुकार, संताप का।
उसे नहीं अधिकार यहाँ है जीवन की एक भी साँस का।
आ जाओ कोई तो बनकर राम, कृष्ण या पाण्डव।
या बनकर आ जाओ महाशिव और करो यहाँ ताण्डव।
और कोई हल नहीं यहाँ शक्ति बनो या बनो काली।
देवियों के इस देश में कैसे बह रही है रक्त की लाली।
खींच लाओ तुम उन्हें उतारकर सड़कों चौराहों पर।
कर दो इनको लहूलुहान गलियों कूचों और राहों पर।
गाँधी बुद्ध के देश में अब आ जाओ बनके परशुराम।
जिसे देखकर ये अत्याचारी चीख पड़ें बस त्राहिमाम।
लो प्रतिज्ञा कोई खींच सके ना द्रौपदी के बालों को।
कौन है जो ललकार सके यहाँ महाकाल के लालों को।
सड़क किनारे लाश बिछेगी उनकी अगर हम चाहें तो।
आग लगा दें उन्हें अगर वो पकड़ें बेटियों की बाँहें तो।
हर दोषी की लाश बिछेगी, इन सबका जब मरण होगा।
जो इनसे हैं हार गयीं, उनके शव पर श्रद्धासुमन होगा।
सुधांशु श्रीवास्तव "जीत"
लाजवाब लेखन बन्धु
ReplyDeleteधन्यवाद भैया
Delete👌👌
ReplyDeleteसही है
ReplyDeleteसही है
ReplyDeleteशानदार वर्तमान समय की दशा एक प्रकाश
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