रायपुर, छत्तीसगढ़
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जिम्मेदारी किसकी
घर कौन चलाता है...
ठीक कहते हो तुम....
औरत की तनख्वाह से घर नहीं चलता...
औरत की ख्वाहिशों से घर चलता है...
सोचना तो तुम्हें है...
तुम इस काबिल हो.. के पूरी कर सको उसकी ख्वाहिशें...?
या.. या फिर.... उसकी तनख्वाह से पूरी... घर की जरूरतें...?
सौदा कर लेते इस बात का भी दहेज़ के साथ...
जरूरतें पूरी करने की जिम्मेदारी होगी किसके हाथ...?
सच मानो... वो एक बार भी ना झिझकती...
अपने परिवार पर है वो जान छिड़कती...
दुनियाँ की रस्मों में बंधी वो ये कब जान सकी...
घर की देहरी को ही वो अपनी मंजिल मान चुकी...
उसकी प्रतिभा की भी थी नहीं कोई सानी...
तुम ना समझ सके ना समझोगे कभी उसकी कुर्बानी...
आज... जब वो चली दो कदम तुम्हारे बिना...
क्यूँ प्रफुल्लित नहीं हुआ गर्व से तुम्हारा सीना...
तुम्हारी हर कामयाबी पर इतराई वो जी भर कर..
उसकी छोटी सी कामयाबी को तौल दिया तुमने सिक्कों पर...
याद रखना... स्त्री तुम्हें अपना समझती है... मजबूरी नहीं...
क्यूंकि... स्त्रैण गुण के लिए स्त्री होना ज़रूरी नहीं...
रश्मि.....
Awesome line
ReplyDeleteVery nice lines
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