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शीर्षक - शरीर और मन
खेल जीवन का शरीर और मन से ही होता है ।
इसलिए जीवन में हर पल तनाव रहता है ।
शरीर की इच्छा सब कुछ खाकर ,अपना रुप छोड़ ,जाना होता है ।
न मिले जगत में मान-सम्मान तो मन बड़ा रोता है ।
मन का किया शरीर ही ढोता है ,शरीर और मन की कारनामे देख ।
आत्मा बहुत बैचेन होता है ।
दिवस कर्म से थक हार कर शरीर सो जाता है ।
मन की महिमा अपरंपार है , सपनों में भी जागता रहता है ।
मन अगर सध जाये तो ,नया जीवन मिल जाता है ।
पत्थर में भी है भगवान इंसान उसे देख लेता है।
मिला है मिट्टी से यह शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जाता है ।
जिंदा नहीं होता ,वह मन और शरीर जो भगवान के
नियम विरुद्ध कर्म करता है ।
जो मन शरीर से उपर उठकर कर्म करता है ,जिंदा वही
रहता है ।बाकी सब मिट जाता है
शरीर की बीमारी तो दर्द देती है ।
मन की बीमारी तो बहुत बड़ी है ।जीते जी जीवन ले लेती है ।
पर मन की आदत ऐसे होती है ,टिकता नहीं किसी एक जगह पर ,हर पल भटकता रहता है ।
शरीर चलता मन से ।
मन के अधीन सारा जहान है ।
जो जीत जाये मन को
संसार में उसकी अलग पहचान है ।
मन को जीत कर , कोई बुद्ध , कोई कृष्ण ,और राम हो जाते हैं ।
मन और शरीर की कामनाओं में फंसकर । संसारी हर पल रोते है ।
Nice
ReplyDeleteNice one
Deleteधन्यवाद
DeleteNice poetry bose ji
ReplyDeleteधन्यवाद
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