राज्य- (झारखंड) रांची
शीर्षक- विवाह
विवाह*
रिश्ते जो,
स्वर्ग में बनी और
धरा पर आई।
डोर जो दिल से बंधी और
दिल पर छाई।
शहनाई प्रेम की,
है जिसने बजाई।
वो अनमोल बंधन,
विवाह कहलाई।
दामन थामे प्रीत का,
चल पड़े रित निभाने।
नई रेस्में, नई कसमें और
कुछ नई उलझनों के साथ
बांधने यह बंधन।
बन पति -पत्नी
दो अनजान,
एक खून हो जाते।
प्रेम बसाया इतना की
दो जिस्म
एक जान हो जाते।
प्रेम और विश्वास है,
विवाह के दो स्तंभ।
साथ हमदम का हो,
तो सह जाए इस,
दुनिया के सारे सितम।
मिलन दो दिलों का,
दो परिवारों का,
कदम कदम साथ चल
अपनी दुनिया है बसाते।
जिम्मेदारियां होती बहुत सारी
जिसे दोनों जन कंधे पर उठा
अपने गृहस्थी हैं चलाते।
लाख कर लो टिप्पणी।
चाहे उड़ा लो लाख खिल्ली।
विवाह जिसका हो सफल,
समझो उसकी गाड़ी पड़ी निकल।
✍डॉ अलका कुमारी
(झारखंड) रांची✍
वाह विवाह की सही परिभाषा से भरी रचना
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