शीर्षक-आसमां नापेंगी औरतें
राज्य-छत्तीसगढ़
प्रेम में थरथराती औरतों को
अब खौफ से न डराओ।
आत्मरक्षा का कवच बांधेंगी
औरतें।
थोड़ी-सी धूप के लिए बरसों
तरसीं हैं,
सूरज को अपनी गोद में चांपेगी
औरतें।
बादल में छुपी चांद कहना छोड़
दो अब उसे,
बादलों को निचोड़ अब गंगा जल
बांटेगी औरतें।
अब चोटियां खींच कर नोंचना
छोड़ दो,
हिमालय की ऊंची चोटियों को
नापेंगी औरतें।
घर की देहरी नापना अपराध था
जिनके लिए,
अब घर से बाहर निकल आसमां
नापेंगी औरतें।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर
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