कुमार तनसुख
श्रीमाधोपुर , राजस्थान
कविता
शीर्षक:- कुछ शब्द भी कह नहीं पाते हैं
सम्पर्क:- 9351212400
रावण के पुतले को बेशक
हर साल जला हम आते हैं ।
हर शहर शहर वहसी रावण
उनसे क्यों नजर चुराते है ।।
लुटने पर अस्मत ज्ञानीजन
निर्भया पे दोष मंढ जाते है ।।
शर्म हया कुछ बची नहीं
सभ्य समाज कहलाते है ।।
चित्कार के आदि कान हुए
जो बस सुनते रह जाते है ।
धृतराष्ट्र सभा सा हुआ देश
कोई कुछ भी ना कर पाते हैं ।।
ऐसी भी क्या नामर्दी
इतनें भी क्या लाचार हुए।
विरोध सामने करते नहीं
फ़िर मोमबत्तियाँ जलाते है ।।
रो रही कलम सिसकी कविता
कुछ शब्द भी कह नहीं पाते है ।
इस नशे का वहसीपन देखों
मुर्दा से भी वहस मिटाते है ।।
कुमार तनसुख
हृदयस्पर्शी कविता,
ReplyDeleteकेंद्र सरकार से निवे्दन
" बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" की जगह
"दरिंदो को सबक सिखाओ बेटीयो को बचाओ"
अभियान चलाना चाहिए।😰😰😰
AsHuKmT
धन्यवाद भाई
Deleteचलो रीगंस श्रीमाधोपुर से शुरू करें।
धन्यवाद भाई
Deleteचलो अपने कस्बे से शुरू करें।
Kuch shbd bhi kh Nhi pate h..... Heart touching .....fabulous,
ReplyDeleteजीजी
Deleteवास्तविक और तात्कालिक रचना.... सामाजिक चेतना आवश्यक
ReplyDeleteहौसलाअफजाई के लिए धन्यवाद सर
Delete🙏🙏🙏🙏🙏
बहुत ही सुन्दर रचना है भाई जी।
ReplyDeleteवाह सखा.. क्या बात कही है.. आज के समय मे सब रावण बने घूम रहे है कोन किसको जलाये.. बस मोमबतियां जला के अपना कर्तव्य पूरा समझ लेते है
ReplyDeleteधन्यवाद 🙏🙏🙏
Deleteबहुत ही मार्मिक
ReplyDeleteजी शुक्रिया 🙏🙏🙏
ReplyDeleteKya baaaaat ha
ReplyDeleteनिन्दनीय घटना का सटीक चित्रण
ReplyDeletevery beautiful Poem
ReplyDeleteTaken action immediately
ReplyDeleteVery nice sir ji Achi lgi
ReplyDeleteबहुत सुन्दर 🌹🌹
ReplyDeleteमार्मिक रचना
ReplyDeleteBahut badiya bhai sab ji
ReplyDelete😂😂😂😂 nice line
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