Monday, December 2, 2019

राजस्थान से कुमार तनसुख की कविता- कुछ शब्द भी कह नहीं पाते हैं

कुमार तनसुख 
श्रीमाधोपुर , राजस्थान 
कविता 
शीर्षक:- कुछ शब्द भी कह नहीं पाते हैं 
सम्पर्क:- 9351212400

रावण के पुतले को बेशक 
हर साल जला हम आते हैं  ।
हर शहर शहर वहसी रावण
उनसे क्यों नजर चुराते  है  ।।

लुटने पर अस्मत ज्ञानीजन 
 निर्भया पे दोष मंढ जाते है  ।।
 शर्म हया कुछ बची नहीं 
सभ्य समाज कहलाते है   ।।

चित्कार के आदि कान हुए
जो बस सुनते रह जाते है  ।
धृतराष्ट्र सभा सा हुआ देश
कोई कुछ भी ना कर पाते हैं  ।।

ऐसी भी क्या नामर्दी 
इतनें भी क्या लाचार हुए। 
विरोध सामने करते नहीं 
फ़िर मोमबत्तियाँ जलाते है  ।।



रो रही कलम सिसकी कविता 
 कुछ शब्द भी कह नहीं पाते है  ।
इस नशे का वहसीपन देखों 
मुर्दा से भी वहस मिटाते है  ।।
                      कुमार तनसुख

21 comments:

  1. हृदयस्पर्शी कविता,
    केंद्र सरकार से निवे्दन
    " बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" की जगह
    "दरिंदो को सबक सिखाओ बेटीयो को बचाओ"

    अभियान चलाना चाहिए।😰😰😰
    AsHuKmT

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    1. धन्यवाद भाई
      चलो रीगंस श्रीमाधोपुर से शुरू करें।

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    2. धन्यवाद भाई
      चलो अपने कस्बे से शुरू करें।

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  2. Kuch shbd bhi kh Nhi pate h..... Heart touching .....fabulous,

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  3. वास्तविक और तात्कालिक रचना.... सामाजिक चेतना आवश्यक

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    1. हौसलाअफजाई के लिए धन्यवाद सर
      🙏🙏🙏🙏🙏

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  4. बहुत ही सुन्दर रचना है भाई जी।

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  5. वाह सखा.. क्या बात कही है.. आज के समय मे सब रावण बने घूम रहे है कोन किसको जलाये.. बस मोमबतियां जला के अपना कर्तव्य पूरा समझ लेते है

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  6. बहुत ही मार्मिक

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  7. जी शुक्रिया 🙏🙏🙏

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  8. निन्दनीय घटना का सटीक चित्रण

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  9. Taken action immediately

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  10. बहुत सुन्दर 🌹🌹

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