कवि - सुधांशु श्रीवास्तव "जीत"
राज्य - दुर्ग (छत्तीसगढ़)
सम्पर्क- 9691147957
शीर्षक- मैं अंधकार हूँ
राज्य - दुर्ग (छत्तीसगढ़)
सम्पर्क- 9691147957
शीर्षक- मैं अंधकार हूँ
***मैं अंधकार हूँ***
बाणों की हूँ झंझावात धनुष की टंकार हूँ।
शब्दभेदी मौन को मैं भेदता झंकार हूँ।
राम की इस धरा का स्वप्न मैं साकार हूँ।
मतिहीन निरंकुश विकारों का विकार हूँ।
ज्ञान के प्रकाश से जो न मिटे अंधकार।
उस अंधकार को मिटाने वाला अंधकार हूँ।।
शब्दभेदी मौन को मैं भेदता झंकार हूँ।
राम की इस धरा का स्वप्न मैं साकार हूँ।
मतिहीन निरंकुश विकारों का विकार हूँ।
ज्ञान के प्रकाश से जो न मिटे अंधकार।
उस अंधकार को मिटाने वाला अंधकार हूँ।।
देखो यहाँ चारों ओर अंधकार छा रहा।
मनुष्य ही मनुष्य का लहू नित बहा रहा।
कोई नीति कोई नियम कोई धर्म कहाँ रहा।
शिष्ट नम्र निष्कपट तो रक्त में नहा रहा।
इस अनीति के विरुद्ध कठोर मैं प्रतिकार हूँ।
मैं अंधकार को मिटाने वाला अंधकार हूँ।।
मनुष्य ही मनुष्य का लहू नित बहा रहा।
कोई नीति कोई नियम कोई धर्म कहाँ रहा।
शिष्ट नम्र निष्कपट तो रक्त में नहा रहा।
इस अनीति के विरुद्ध कठोर मैं प्रतिकार हूँ।
मैं अंधकार को मिटाने वाला अंधकार हूँ।।
मातृ-पितृ का निरादर करने वालों सावधान।
निर्वस्त्र किया घर की लाज को जिन्होंने सावधान।
धर्म को पाखण्ड बनाने वालों तुम भी सावधान।
विश्व में आतंक फैलाने वालों को भी सावधान।
इन कुकर्मों के लिए मैं प्रलय का विचार हूँ।
मैं अंधकार को मिटाने वाला अंधकार हूँ।।
निर्वस्त्र किया घर की लाज को जिन्होंने सावधान।
धर्म को पाखण्ड बनाने वालों तुम भी सावधान।
विश्व में आतंक फैलाने वालों को भी सावधान।
इन कुकर्मों के लिए मैं प्रलय का विचार हूँ।
मैं अंधकार को मिटाने वाला अंधकार हूँ।।
पाप हो कोई भी उसका त्याग कर दिखाइए।
धर्म हो कोई भी चल के सन्मार्ग पर दिखाइए।
मानव हो तो मानव से प्रेम कर दिखाइए।
राम राम जपते हो तो राम बनकर दिखाइए।
पाप पुण्य का गणित करता मैं तैयार हूँ।
मैं अंधकार को मिटाने वाला अंधकार हूँ।।
धर्म हो कोई भी चल के सन्मार्ग पर दिखाइए।
मानव हो तो मानव से प्रेम कर दिखाइए।
राम राम जपते हो तो राम बनकर दिखाइए।
पाप पुण्य का गणित करता मैं तैयार हूँ।
मैं अंधकार को मिटाने वाला अंधकार हूँ।।
सुधांशु श्रीवास्तव "जीत"

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