नाम- देविका साहू
रायपुर, छत्तीसगढ़
कविता का शीर्षक- "बेपरवाह जीवन जियो"
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ज़िन्दगी सरल हो जायेगी,
रिश्तों को उम्मीदों से परे रखकर तो देखो।
रायपुर, छत्तीसगढ़
कविता का शीर्षक- "बेपरवाह जीवन जियो"
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ज़िन्दगी सरल हो जायेगी,
रिश्तों को उम्मीदों से परे रखकर तो देखो।
पार कर जाओगे सारे फासले,
मतलब की कश्ती से उतर कर तो देखो।
मतलब की कश्ती से उतर कर तो देखो।
खत्म हो जायेगी शाँति की तलाश,
बेपरवाह अपनों के साथ गोता लगाकर तो देखो।
बेपरवाह अपनों के साथ गोता लगाकर तो देखो।
स्याह नमकीन द्वेष के सागर में क्यों खुद को डुबोना,
उजली झील में बेखौफ, बेहोड़ खुद को खोकर तो देखो।
उजली झील में बेखौफ, बेहोड़ खुद को खोकर तो देखो।
होंगे कुछ जिन्होंने ज.ख्म कुरेदे होंगे,
ईश्वर के भरोसे उनके अंजाम छोड़कर तो देखो।
ईश्वर के भरोसे उनके अंजाम छोड़कर तो देखो।
दुनिया में आये थे निर्दोष, बेदाग,
उसी मासूमियत से एक बार खिलखिलाकर तो देखो।
उसी मासूमियत से एक बार खिलखिलाकर तो देखो।
छोड़ चुके जिन जिगर के टुकड़ों को पीछे,
फिर से उन्हें प्यार से पुकार कर तो देखो।
फिर से उन्हें प्यार से पुकार कर तो देखो।
द्वेष, दर्द, क्रोध के सारे मुखौटे उतर जायेंगे,
एक बार इन जंजालों को हटाकर तो देखो।
एक बार इन जंजालों को हटाकर तो देखो।
जाना तो है उस संसार में वापस,
एक बार अपनों को अपना बनाकर तो देखो।
एक बार अपनों को अपना बनाकर तो देखो।
स्वर्ग-नरक तो सब उसका हिसाब-किताब है,
एक बार अपना हिसाब सुधारकर तो देखो।
एक बार अपना हिसाब सुधारकर तो देखो।
नहीं बनना कोई पीर-फकीर,
पर खुदा ने जो बनाया था वो इंसान बनकर तो देखो।
पर खुदा ने जो बनाया था वो इंसान बनकर तो देखो।

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