Friday, November 1, 2019

असम से कवि राजु बड़ो (बर) की रचना- आग

नाम: राजु बड़ो (बर') ,
माजबाट,उदालगुरि
राज्य: असम
मो: 9101810538
शीर्षक: आग


दिल में प्रज्ज्वलित दीप
मेरी मन की चैन को हरे
धैर्य का बंधन को तोड़कर
आड़ या पार के लिए कहे।
उष्ण रक्त नस-नस में प्रवाहित होकर
मेरी वदन को तप्ते
जैसे बन रहे आग का गोला हो
जग की सारी बुराई भस्म करनेवाला हो।
या मालिक के करुणा से
प्रदीप्त दीप बन जायें
अंधेरे को मिटा दें तबतक
बुराईयाँ जड़ से न उखड़े जबतक।
बुरा करनेवालो ठहर जरा
यह सबके सीने में जलती हुई आग है
एक आगाज का इंतजार में है
कतई देर नहीं तुझे खाक बनने में।
जज्बात का कदर करना सिखो
जज्बाती बनकर बहक न जाओ
सिर्फ अपने सपनों का लक्ष्य खातिर
दूसरों के रौंदना प्रकृति का रिवाज नही है।
होश संभालकर बैठे हैं
इंतजार में कि बदल जाओ
यह दीप बुझने वाला नहीं है
सुप्त ज्वाला बनकर बैठा है।
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राजु बड़ो, असम।

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