Monday, November 11, 2019

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- पिया का घर

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राजस्थान
शीर्षक - - पिया का घर


पिता का घर छोड़, पिया का घर बसाती हूँ।
पल-पल सहनशीलता, समर्पण, क्षमा सिखलाती हूँ।
रंग-बिरंगे कांच के कंगन,
चीनी मिट्टी के वो छोटे छोटे बर्तन,
नीम की डाली पर छोटा-सा झूला,
सारे अधखिले सपने मोड़ आती हूँ।
पिता का घर छोड़, पिया का घर बसाती हूँ।
वो सखियाँ, गांव, गली, आंगन,
भाई-भौजाई, माँ का आंचल,
मिट्टी का वो सजीला घर,
सुंदर गुड़िया औ उसका काना वर,
संभाला था जिन्हें, तोड़ आती हूँ।
पिता का घर छोड़, पिया का घर बसाती हू।
तन के रक्त की बूंद बूंद से पोषित,
नव सृष्टि संसार में लाती हूँ।
वो कष्ट, पीड़ा और यंत्रणा सब,
ममत्व में भूल जाती हूँ।
संतति की बस एक स्निग्ध स्मित से,
आनन्द के उत्ताल सागर में झूम जाती हूँ।
पिता का घर छोड़, पिया का घर बसाती हूँ।
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"

22 comments:

  1. रियल में सर इस रचना ने तो अंतकरण को छू लिया

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  2. 👌 👌 एक लड़की की वास्तविक सच्चाई आपने व्यक्त की है।

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  3. धन्यवाद सभी साथियों का

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  4. नारी की पूर्णता को दर्शाती श्रेष्ठ रचना। गागर में सागर भर दिया, गुरु ।

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  5. त्याग , समर्पण,स्नेह, आदर्श, संस्कार , कर्त्तव्य निष्ठा, सामंजस्यता, संवेदना , एकनिष्ठ प्रेम भावना आदि मानवीय मूल्यों से पुरित आपकी रचना अनुपम है।

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  6. अधखिले सपने.... मां का आंचल... कितना मार्मिक है, कल्पना मात्र से सांसें रुक जाये, लेकिन धन्य है नारी...

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  7. तनसुख कुमावत
    शानदार रचना गुरू

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    1. तनसुख भाई को नमस्कार

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  8. अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए आपका हार्दिक आभार

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  9. बहुत अच्छी कविता

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