संजय जैन (मुम्बई)
महाराष्ट्रा
बचपन की यादे
महाराष्ट्रा
बचपन की यादे
याद आ रहे है हमे,
वो बचपन के दिन।
जिसमे न कोई चिंता,
और न ही कोई गम।
जब जैसा जहां मिला,
खा पीर हो गए मस्त।
न कोई जाति का झंझट,
न कोई ऊंच नीच का भेद।
सब से मिलकर रहते थे,
जैसे अपनो के बीच ।
पर जैसे-2 बड़े होते गये,
वो सब हमे सीखा दिया।
बचपन में अनभिज्ञ थे जिससे,
वो स्वार्थ के लिए सीखा दिया।
और मानो हमे बचपन का,
सारा मतलब ही भूला दिया।
तभी तो लोग कहते है,
लौटकर बचपन आ नही सकता।
और बचपन की यादों को,
भूलाया जा नही सकता।।
वो बचपन के दिन।
जिसमे न कोई चिंता,
और न ही कोई गम।
जब जैसा जहां मिला,
खा पीर हो गए मस्त।
न कोई जाति का झंझट,
न कोई ऊंच नीच का भेद।
सब से मिलकर रहते थे,
जैसे अपनो के बीच ।
पर जैसे-2 बड़े होते गये,
वो सब हमे सीखा दिया।
बचपन में अनभिज्ञ थे जिससे,
वो स्वार्थ के लिए सीखा दिया।
और मानो हमे बचपन का,
सारा मतलब ही भूला दिया।
तभी तो लोग कहते है,
लौटकर बचपन आ नही सकता।
और बचपन की यादों को,
भूलाया जा नही सकता।।
संजय जैन (मुम्बई)

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