कवियित्री का नाम- गार्गी सिंह
शीर्षक- तुम पूर्ण हो स्त्री
राज्य- महाराष्ट्र
शीर्षक- तुम पूर्ण हो स्त्री
राज्य- महाराष्ट्र
घर-बाहर, जीवन के हर स्वरूप में
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
आँखों की लज्जा में
मासूम-सी मुस्कान में
अपनों की ख़ुशी में
रसोई की रोटी में
तुम सदैव प्रयासरत रहतीं
तुम अचल, अडिग रहतीं!
तुम पूर्ण समर्पित अपने भाव-रूप में,
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
मासूम-सी मुस्कान में
अपनों की ख़ुशी में
रसोई की रोटी में
तुम सदैव प्रयासरत रहतीं
तुम अचल, अडिग रहतीं!
तुम पूर्ण समर्पित अपने भाव-रूप में,
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
पत्नी के सिंदूर में
प्रेम के समर्पण में
बहन की राखी में
बेटी के अपनत्व में
हर धुरी पर कसी
हर कसौटी पर खरी
ठंडी छाँव हो तुम दहकती धूप में
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
प्रेम के समर्पण में
बहन की राखी में
बेटी के अपनत्व में
हर धुरी पर कसी
हर कसौटी पर खरी
ठंडी छाँव हो तुम दहकती धूप में
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
होली के रंगों में
दिवाली के दीयों में
घर की चौखट में
आँगन की रौनक में
तुम ही हो सजी
तुम ही तो रची-बसी
बसंती बयार तुम, कोयल की कूक में
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
दिवाली के दीयों में
घर की चौखट में
आँगन की रौनक में
तुम ही हो सजी
तुम ही तो रची-बसी
बसंती बयार तुम, कोयल की कूक में
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
कवि की कविता में
रिश्तों की गरिमा में
माँ की ममता में
कर्तव्यों की चुनौती में
तुम धारा सी अनवरत
बहतीं, कभी न रुकतीं
लक्ष्मी, दुर्गा सब तुम्हारे रूप में
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
रिश्तों की गरिमा में
माँ की ममता में
कर्तव्यों की चुनौती में
तुम धारा सी अनवरत
बहतीं, कभी न रुकतीं
लक्ष्मी, दुर्गा सब तुम्हारे रूप में
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
अश्रु की धार में
भक्ति में, भाव में
जीवन के खेल में
स्थितियों के मेल में
सब जीत लेती हो
फिर भी हार का डर,
तुम्हारे सुलझे अंतर्मन की हूक में,
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
भक्ति में, भाव में
जीवन के खेल में
स्थितियों के मेल में
सब जीत लेती हो
फिर भी हार का डर,
तुम्हारे सुलझे अंतर्मन की हूक में,
तुम पूर्ण हो स्त्री अपने हर रूप में!
गार्गी सिंह

Sachchi rachna
ReplyDeleteBeautyful
ReplyDeleteSuperb
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