कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-मेरे गांव के बच्चे
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
शीर्षक:-मेरे गांव के बच्चे
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
मेरे गांव के बच्चे
सुना है अब मेरे गांव के,
सारे बच्चे बडे हो गये...
कोई हिंदु तो कोई,
मुसलमान हो गये...
खैर ये तो मजहब की बात है,
पर वे बडे छुपे रुस्तम से हो गये..
यकायक ही एक दुजे के,
वो दुश्मन से हो गये...
पलट कर देखा जब जिदंगी को..
कुछ हसीन लम्हे याद आ गये....
वो मजे, वो खेल और ..
माहौल याद आ गये...
वो जमाने भी क्या रंग बिंरगे थे..
जब सबके हाथ मे तिंरगे थे..
गांव गांव गली गली पैगाम थे..
तिंरंगे के ही चर्चे सरे आम थे...
तब सारे बच्चे मासुम थे..
सब के सब इंसान थे...
सारे बच्चे बडे हो गये...
कोई हिंदु तो कोई,
मुसलमान हो गये...
खैर ये तो मजहब की बात है,
पर वे बडे छुपे रुस्तम से हो गये..
यकायक ही एक दुजे के,
वो दुश्मन से हो गये...
पलट कर देखा जब जिदंगी को..
कुछ हसीन लम्हे याद आ गये....
वो मजे, वो खेल और ..
माहौल याद आ गये...
वो जमाने भी क्या रंग बिंरगे थे..
जब सबके हाथ मे तिंरगे थे..
गांव गांव गली गली पैगाम थे..
तिंरंगे के ही चर्चे सरे आम थे...
तब सारे बच्चे मासुम थे..
सब के सब इंसान थे...
वे बच्चे अब बडे हो गये,
तिंरगे के रंग आपस मे बट गये...
कोई केशरीये हो गये..
तो कोई 'हरे' भरे हो गये,
तो कोई 'निला'म य हो गये..
बचे खुचे कुछ 'मा' ओ के लाल हो गये ..
अब सच मे 'लाल' म 'लाल' हो गये...
कुछ तो मालामाल हो गये,
तो कुछ जिंदगी के बोझ को,
ढोते ढोते बेहाल हो गये...
मेरे गांव के बुरे हाल हो गये,
सच मे मेरे गांव के बच्चे
अब "बडे" हो गये ...
# संजय वासनिक"वासु"...
~25102017
तिंरगे के रंग आपस मे बट गये...
कोई केशरीये हो गये..
तो कोई 'हरे' भरे हो गये,
तो कोई 'निला'म य हो गये..
बचे खुचे कुछ 'मा' ओ के लाल हो गये ..
अब सच मे 'लाल' म 'लाल' हो गये...
कुछ तो मालामाल हो गये,
तो कुछ जिंदगी के बोझ को,
ढोते ढोते बेहाल हो गये...
मेरे गांव के बुरे हाल हो गये,
सच मे मेरे गांव के बच्चे
अब "बडे" हो गये ...
# संजय वासनिक"वासु"...
~25102017

बहुत खूबसूरत रचना ।
ReplyDeleteWa WA kya bat koi NEELA M ho Gaye to koi MAO k lal ho Gaye bahot badhiya sir ek alag hi Dhar hai aapki Kavita me jo cheerti hai is jamane ki kartutob Ko.
ReplyDeleteNice poem. Thought provoking and true
ReplyDeleteबहोत खूब , सत्य वचन
ReplyDeleteबहोत ही खूबसुरत एवंम वास्तववादी रचना..!!
ReplyDeleteVery nice poem. Very true.
ReplyDeleteबहोत खुब संजय
ReplyDeleteReal picture of society is expressed in poem.
ReplyDeleteKya khoob sir
ReplyDeleteVery True Nice poem.
ReplyDeleteBahot khub
ReplyDeleteKhup Chan sir.👏👏👏👏
ReplyDeleteबहुत खूब। अलग अलग सिर्फ रंग है। इकट्ठे देश का प्रतीक।
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