कवयित्री का नाम-मीरा आर्ची चौहान
शीर्षक-झोला
राज्य-छत्तीसगढ़
वर्षों से कुचला गया।
अवहेलना की,
थापी पर
मूंग दला था
पालीथीन ने
सब झोलों की
छाती पर
राज किया
इतरा -इतरा
कर रंग -बिरंगी
डिजाइनों में।
दूर -दूर तक
नाम नहीं था
झोला की
लंबी लाइन में।
स्टोर रुम में
दम घुट रहा था
दबे कुचैले
कपड़ों में।
कभी शान से
इतराता था
साइकिल की
हैडिलों में।
सब्जी, भाजी
फल ,मिठाई
आ जाते
एक ही झोले में।
पालीथीन ने
कैद कर दिया
कपड़ों के पुराने
मलबे में।
पर्यावरण को
क्षति पहुंचाया
पालीथीन के
जलवे ने।
पशु- हत्या
और बंजर भूमि
पालीथीन के
के करामात हैं,
उसके इस
कुचक्र में भी
मानव का ही
बड़ा हाथ है
बुरे वक्त में
संयम ने ही
झोले को
जीवन दान
दिया।
प्रकृति के
आहृवान ने ही
अब झोले को
फिर सम्मान
दिया।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर
शीर्षक-झोला
राज्य-छत्तीसगढ़
वर्षों से कुचला गया।
अवहेलना की,
थापी पर
मूंग दला था
पालीथीन ने
सब झोलों की
छाती पर
राज किया
इतरा -इतरा
कर रंग -बिरंगी
डिजाइनों में।
दूर -दूर तक
नाम नहीं था
झोला की
लंबी लाइन में।
स्टोर रुम में
दम घुट रहा था
दबे कुचैले
कपड़ों में।
कभी शान से
इतराता था
साइकिल की
हैडिलों में।
सब्जी, भाजी
फल ,मिठाई
आ जाते
एक ही झोले में।
पालीथीन ने
कैद कर दिया
कपड़ों के पुराने
मलबे में।
पर्यावरण को
क्षति पहुंचाया
पालीथीन के
जलवे ने।
पशु- हत्या
और बंजर भूमि
पालीथीन के
के करामात हैं,
उसके इस
कुचक्र में भी
मानव का ही
बड़ा हाथ है
बुरे वक्त में
संयम ने ही
झोले को
जीवन दान
दिया।
प्रकृति के
आहृवान ने ही
अब झोले को
फिर सम्मान
दिया।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर

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