नाम :- गणपति सिंह
शीर्षक - बाप की साया
राज्य:- बिहार
मो०- 9798420202
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बाप की साया
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घर से निकला
काम पर जाने को
मन था अधीर।
तेज हवा के झोंखो ने
दोनों पैरो में
बांध दिये जंजीर।
बेताब बूंदें, धरा को
चुमने को व्याकुल
थी बूंदें आतुर।
कशमकश में
मैं पड़ा, भींगू
या कहीं छूप जाऊँ।
नजरें घुमाई
चारो ओर
एक झोपडी़ दिया दिखाई।
सर पे पैर
रख के भागा
तभी मन गया मिचलाई।
रूकूं भागूं या
छीपा लूं अपने
अपने अधसुखे बदन को।
मजबूरी थी,
ना रूक सका, ना भागा सका
अपने गीले जीश्म को।
था अकेला एक बच्चा
बेतरतीब कपड़ों में
मुझे देख सकुचाया।
गरीबी के आलम में
हाथ जोड़े, कातरता से
सुखे होठों से मुस्काया।
साहब बाप नहीं है
माँ है एक मजूरन
पलकें झुकाये बतलाया।
मैनें पूछा पढ़ते हो
स्कूल में जाते हो
आहिस्ता उसका सर सहलाया।
खाने को दाने नहीं
पहनने को कपड़े नहीं
छलकती आंखों से बतलाया।
मै भूल गया मिचलाई
भूल गया ताड़ीखाना
बच्चे की लाचारी ने मुझे रूलाया।
सुखी धरती को भिंगोतीं रहीं
बारिश की बूंदें
भींगते रही मेरी भी काया।
हे भगवान हे गणपति
आरज़ू है किसी के सर से
ना उठाना बाप की साया।
गणपति सिंह
छपरा बिहार
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