नाम_ संतोष श्रीवास्तव सम
राज्य _ छत्तीसगढ
मोबाइल ९९९३८१९४२९
शीर्षक _ लिखो कवि तुम,
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लिखो कवि तुम
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लिखो कवि कुछ आज यहां तुम,
गिरि का गौरव तरूओं का नाद,
ले रही झकोरे पवन यहां,
मन में इक होता है उन्माद।
कवि यहां कुछ गान हो ऐसा,
सरोवर देने लगे ताल,
एक यहां से दूर वहां तक,
फैला हो मोहन का जाल।
अस्तित्व दिखे बस एक इसी की,
एक यही स्वर हो गुंजाय,
मानव प़कृती हो एक रस,
एक राग बस घुलता जाये।
चाहे महाप़लय भी आये,
चाहे खड़ा हो महाकाल,
ओ कवि कलम की बेदी पर,
हो जाये तेरा ऊंचा भाल।
कवि लिखो कैसे वारिद ये,
अपने पर फैलाये उड़ते,
दूर गगन में गिरि से ये,
अपना स्पर्श किये फिरते।
गिरि की द़ढता गिरि का संबल,
अवनि से फैला अंबर तक,
कैसे कोई पार है पाये,
वृहद् शिलाओं के तल तक।
आदर्श गढे तू चल इसका,
बस संबद्ध इसी से होना है,
लिखो कवि अब न डिगना,
बस इसके सानिध्य में रहना है।
__ संतोष श्रीवास्तव सम
कांकेर
छत्तीसगढ।
Wednesday, October 9, 2019
छत्तीसगढ़ से कवि संतोष श्रीवास्तव सम की रचना- लिखो कवि तुम
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