कवि,,, सुनीता लुल्ला
राज्य,,, तेलंगाना
शीर्षक,,, साँवरे
मो,,, 9391173094
ग़ज़ल
1222 1222 122
सबक तुम प्यार का मुझको सिखा दो
ये दिल लेना भी थोड़ा सा
बता दो
वो जिसकी हो गयी थी मैं दिवानी
वही बंसी की धुन फिर से सुना दो
मैं ही जमुना के पानी सी बही थी
कभी चरणों को धोना फिर सिखा दो
कभी तो आके फिर फोड़ो गगरिया
कभी तन-मन को मेरे फिर भिगा दो
बनूँ फिर फूल बैजंती की माला
इसी हिरदय से यूँ ही फिर लगा दो
करो प्राणों में फिर से रास वो ही
शरद पूनम में मुझको फिर सजा दो
बहुत की है तुम्हारी ही प्रतीक्षा
झलक इक साँवरे आ कर दिखा दो
तुम्हारी आन है मेरी नहीं है
वचन तुम आज अपना ही निभा दो
मेरे सीने में कितने छेद मोहन
कि मुरली सा अधर से फिर लगा दो
सुनीता लुल्ला
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