1, कवि, सुलोचना परमार "उत्तरांचली"
2, शीर्षक , हिंदी
3, सम्पर्क , 7457855051
4, राज्य..उत्तराखण्ड
2, शीर्षक , हिंदी
3, सम्पर्क , 7457855051
4, राज्य..उत्तराखण्ड
*हिंदी*
भारत माँ के भाल चमकती
मैं ...वो ..बिंदी ...हूँ ।
जो हिन्द देश का मान बढाये
मैं ....वो.... हिंदी ... हूँ ।
मैं ...वो ..बिंदी ...हूँ ।
जो हिन्द देश का मान बढाये
मैं ....वो.... हिंदी ... हूँ ।
सदियों से मुझ से ही तो
ज्ञान की ज्योति जली है।
मेरी ही गोदी में छोटी
उर्दू बहिन पली है ।
अपने देश की सभी भाषाएँ
लेकर साथ चली हूँ।
ज्ञान की ज्योति जली है।
मेरी ही गोदी में छोटी
उर्दू बहिन पली है ।
अपने देश की सभी भाषाएँ
लेकर साथ चली हूँ।
*मैं हिंदी हूँ*
मेरा ही परचम लहराया
विश्व में विद्वानों ने ।
सहज ,सरल हूँ इसीलिए
दिखती हूँ रचनाओं में ।
मैं ही हूँ जो मंचों पर
सबकी शान बढ़ाती हूँ।
विश्व में विद्वानों ने ।
सहज ,सरल हूँ इसीलिए
दिखती हूँ रचनाओं में ।
मैं ही हूँ जो मंचों पर
सबकी शान बढ़ाती हूँ।
*मैं हिंदी हूँ*।
प्यार मुहब्बत दिल की धड़कन
मुझ से ही सहारा पाते हैं।
मेरी शरण में आकर ही वो
गीत प्यार के गाते हैं।
सबकी माँ के होंठो पर मैं
लोरी बन सज जाती हूँ ।
मुझ से ही सहारा पाते हैं।
मेरी शरण में आकर ही वो
गीत प्यार के गाते हैं।
सबकी माँ के होंठो पर मैं
लोरी बन सज जाती हूँ ।
*मैं हिंदी हूँ*।
आये विदेशी इस धरती पर
अपनी अपनी भाषा लेकर ।
मेरा मान मर्दन करने को
अंग्रेजी वो आये लेकर ।
टूट नहीं सकती है जो
मैं वो खड़ी चट्टान हूँ ।
अपनी अपनी भाषा लेकर ।
मेरा मान मर्दन करने को
अंग्रेजी वो आये लेकर ।
टूट नहीं सकती है जो
मैं वो खड़ी चट्टान हूँ ।
*मैं हिंदी हूँ*।
मैं खुद से खुद को सजाये हूँ
कंठ, तालव्य,मूर्धन्य, दंतीय
ओष्ठ्य, अंतस्थ, ऊष्मा सबकी
वैज्ञानिकता ओढ़े बिछाये हूँ ।
आदिकाल ऋषियों ने सहेजा
अब तुम्हारी थाती हूँ ।
कंठ, तालव्य,मूर्धन्य, दंतीय
ओष्ठ्य, अंतस्थ, ऊष्मा सबकी
वैज्ञानिकता ओढ़े बिछाये हूँ ।
आदिकाल ऋषियों ने सहेजा
अब तुम्हारी थाती हूँ ।
*मैं हिंदी हूँ*।
स्व रचित
स्व रचित
नाम- सुलोचना परमार
" उत्तरांचली"
" उत्तरांचली"

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