नाम : अपर्णा शर्मा "शिव संगीनी"
गुजरात
विधा : हास्य कविता
गुजरात
विधा : हास्य कविता
*करवा चौथ*
एक दिन मेरे पति छत पर खड़े थे
संजोग की बात थी उस दिन थी करवा चौथ
वह मेरे लिए चांद खोजते थे
और मेरी पड़ोसन अपने लिए चांद खोजती थी
मेरे पति जोकि काले हैं और गंजे हैं सिर पर बहुत सारा तेल लगाते हैं
वह एक तरफ अंधेरे में खड़े थे
नीले अंबर की रोशनी में उनकी टाँड चमचमाती थी
वहीं पर मेरी सखियां भी खड़ी थी
कि अचानक मेरी सखी को हुआ भ्रम वह बोली
देखो चांद निकल आया सब बोली एक साथ चलो भोग लगाती हैं
और उन्होंने दिए कि लौ को आगे कर दिया
आरती बोलने लगी तभी एक सखी ने कहा
ऐसा लगता है आज चांद बहुत करीब आया
दीपक की लौ को उन्होंने आगे बढ़ाया
दीपक की लौ से मेरे पति के बाल झुलस गए और बहुत जोर की चिल्लाए
और बोले क्या मैं इतना सुंदर दिखता हूँ तुम्हारी करवा चौथ का चाँद दिखता हूँ ।।
एक दिन मेरे पति छत पर खड़े थे
संजोग की बात थी उस दिन थी करवा चौथ
वह मेरे लिए चांद खोजते थे
और मेरी पड़ोसन अपने लिए चांद खोजती थी
मेरे पति जोकि काले हैं और गंजे हैं सिर पर बहुत सारा तेल लगाते हैं
वह एक तरफ अंधेरे में खड़े थे
नीले अंबर की रोशनी में उनकी टाँड चमचमाती थी
वहीं पर मेरी सखियां भी खड़ी थी
कि अचानक मेरी सखी को हुआ भ्रम वह बोली
देखो चांद निकल आया सब बोली एक साथ चलो भोग लगाती हैं
और उन्होंने दिए कि लौ को आगे कर दिया
आरती बोलने लगी तभी एक सखी ने कहा
ऐसा लगता है आज चांद बहुत करीब आया
दीपक की लौ को उन्होंने आगे बढ़ाया
दीपक की लौ से मेरे पति के बाल झुलस गए और बहुत जोर की चिल्लाए
और बोले क्या मैं इतना सुंदर दिखता हूँ तुम्हारी करवा चौथ का चाँद दिखता हूँ ।।

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