प्रज्ञा जैमिनी
राज्य- दिल्ली
विधा-कविता
शीर्षक- भारत का लाल
पद,प्रतिष्ठा, मान-मर्यादा का था,जिन्हें लोभ नहीं
निर्धन परिवार में थे जन्मे,पर था बिलकुल क्षोभ नहीं
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी,नहीं आया उनमें अभिमान
चाह थी उनकी, विश्व में बढ़े भारत का सम्मान
पाकिस्तानी हमले का, दिया मुँहतोड़ जवाब, जाकर वहीं
'जय जवान- जय किसान', दिया था जिन्होंने नारा
ऊल-जलूल शर्त सुन अमरीका की,चढ़ा था जिनका पारा
कहा-खाएँगे एक वक्त खाना,लेकिन झुकेगा हमारा सिर नहीं
सादगी, सौम्यता, हिम्मत व आदर्शों की, थे सजीव प्रतिमूर्ति
सरकारी खजाने से नहीं की कभी ,अपनी कामनाओं की पूर्ति
'ताशकंद समझौते 'में हो गए वह राजनीति का शिकार वहीं
बिनकहे समझ गए न आप,'भारत के लाल' का नाम
सत्पुरुष श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को मेरा शत् शत् प्रणाम
स्वार्थों की लड़ाई में, दफन हो गई सच्चाई कहीं
----प्रज्ञा जैमिनी
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