Monday, October 7, 2019

छत्तीसगढ़ से कवि एस के नीरज की रचना- रावण का पुतला

रचनाकार -  एस के नीरज
राज्य -  छत्तीसगढ़
दूरभाष -  99770-45540
शीर्षक-  "  रावण का पुतला "
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सतपुड़ा के घने जंगलों में मैं
एक बार विचरण कर रहा था
कुछ कुछ डरा कुछ सहमा सा
हनुमान चालीसा जप रहा था !

अचानक कहीं सरसराहट उभरी 
बदन पर कंपकपाहट सी ठिठुरी 
किसी ने गुफा से जोर से दहाड़ा 
ओ मानव यहाँ क्यों भटक रहे हो
मेरी नजर में  क्यों खटक रहे हो !

मैंने कहा भूत जी मैं एक कवि हूँ                    और रावण पर कुछ लिखने आया हूँ 
अंदर  फिर जोर की गुर्राहट उभरी
मूर्ख मैं ही दस सिरों वाला रावण
और सोने की लंका की शान हूँ   !

तू मुझ पर क्या लिखेगा ,इधर आ
मैं बताता हूँ तुझे क्या लिखना है
सैकड़ों वर्षों से यही होता आया है
न रावण मरा था न कभी मरेगा
व्यर्थ में क्यों तू अपनी कलम चलाएगा  !

देश की जनता तो पूरी बेवकूफ है
भेड़ की चाल चलना इनकी तुक है
हर वर्ष ये नकली रावण को जलाते हैं
और पुरे देश में खुशियाँ मनाते हैं !

अरे असली रावण तो अभी तक  यहाँ बैठा है
और अमृत का रसपान किये अब तक ऐंठा है
यदि जीवन में कुछ लिखना चाहते  हो
देश के लिए कुछ करना चाहते हो !

तो रावण नहीं राम की खाल में छिपे
इन धूर्त, पाखंडी और बेईमान नेता
और बाबाओं के पुतले जलाओ 
मगर रावण का पुतला मत जलाओ
रावण का पुतला मत जलाओ !

    -  एस के नीरज "  विद्रोही "

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