कवि का नाम- परमानंद निषाद
राज्य- छत्तीसगढ, बलौदाबाजार
शीर्षक- रूठी प्रकृति
मोबाइल- 7974389033
रूठी प्रकृति
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प्रकृति कुछ रूठी-रूठी सी है,
सूर्य की निर्विघ्न तपन का,
जहां कहीं भी धूप सताती,
उसके नीचे झट सुस्ताते,
प्रकृति तुम्हारा आर्कषण है,
युग युग से सुंदर हो तुम,
तुम्ही कराती काम वो सारे,
तुम्ही दिखाती सुंदरता,
नरम है जितनी हवा उतनी फिजा खामोश है,
टहनियो पर ओस पीके हर कली बेहोस है,
ओस बूंद दरपन- सी होगी बेल समान,
सांस मनुज की आंधी-सी करती होगी उसको हैरान,
बादल क्रोधित नभ घनघोर,
बिजली चमक रही चारो ओर,
प्रकृति से नही करो खिलवाड़,
वरना झेलो प्रकृति का प्रहार,
क्यों रूठी हो प्रकृति हमारी,
अजीब डर सारे नर-नारी में,
प्रकृति से हम बिछड़ते जा रहे,
जैसे परदेश जाकर बेटा मां से बिछड़ता है,
प्रकृति कुछ रूठी-रूठी सी है,
सूर्य की निर्विघ्न तपन का,
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