नाम- डॉ अलका कुमारी
राज्य- झारखंड ( राँची)
संपर्क-8541856467
शीर्षक- मैं बेटी हूँ
मैं बेटी हूँ
ईश्वर ने सृष्टि रचा,
विकास ,पालन हेतु स्त्री रचा।
प्रथम स्वरूप बेटी कहलाए।
वंश का आधार बन जाए।
जब उसी आधार पर हो प्रहार।
तो बिगड़ जाए सृष्टि का आकार।
कोख मे उसे मत मार
ना कर ईश्वर का तिरस्कार।
बेटी ना जो तु लायेगा
बहू कहाँ से पायेगा।
वंश वंश जो रटता रहता
उसे कैसे बढ़ायेगा।
बेटा अगर कुल दीपक है,
तो बेटी से ही रौशनी आये।
ये छोटी सी बात,
समझ मे तेरे कब आये।
भ्रूण हत्या जैसा सघण् अपराध कर,
मोक्ष कहाँ से तु पाए।
बेटी की एक गुजरिश;
मत मार मुझे
इस दुनियाँ मे आने दे।
मैंने क्या बिगाड़ा?
क्या मुझसे नही कोई नाता।
आपकी ही अंश हूँ।
आपकी ही कली हूँ,
मत तोड़ मुझे,
अपनी बगियन मे आने दे,
प्यार से सींच
महक से गुलशन को,
खिल जाने दे।
मै भी करूँगी नाम तेरा,
बनूंगी पहचान तेरा।
किसी रावन किसी दुर्योधन के कारण
मेरी जिंदगी नष्ट न होने दे।
बढ़ाऊँगी अभिमान तेरा।
मैं ना आई तो,
राखी किससे बंधवाओगी।
रह जायेगी कलाई सूनी,
त्योहार कैसे मानाओगी।
होली ,नवरात्रि या हो दिवाली
सब रंग फीके पड़ जायेंगे।
बिन मेरे घर तो बना लोगी,
पर स्वर्ग मैं ही बनाऊँगी।
परम्परा की आँधी मे,
मत झोंक मुझे,
शिक्षारूपी शस्त्र दे
हर दानव से लड़ जाऊंगी।
मौका दे बस एक मुझे,
नाम तेरा कर जाऊंगी।
डॉ अलका कुमारी
रांची ( झारखंड)
wah alkaji good poetry
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