कवयित्री का नाम:रीतु देवी"प्रज्ञा"
राज्य-बिहार
रचना :-प्रताड़ित नारी
रहता नहीं अस्तित्व ,होती रहती प्रताड़ित नारी
स्वपन धूमिल हो जाता है उसकी सारी।
नहीं कहीं सुरक्षित है अब भी
मूकदर्शक हो जाते हैं कानून के ठेकेदार भी
मायूसी की झंझावतें छलती है सदा,
कालकोठरी में सिमट जाती उसकी हसीन अदा।
दफन हो जाती है हसरतें उसकी कब्र में
भींगी रहती हरक्षण नयनों अश्रुधार में
कब तलक जुल्म सहती रहेगी ?
तोड़ बेड़ियाँ कब रक्षार्थ बिगुल फूकेंगी?
रीतु देवी "प्रज्ञा"
दरभंगा, बिहार
स्वरचित एवं मौलिक
बहुत ही संवेदनशील रचना
ReplyDelete