रचनाकार नाम-पवन गौतम बृजराही बमूलिया !
राज्य --राजस्थान !
सम्पर्क-9116488506
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गीत (प्रकृति की व्यथा)
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परिमंडल अब सिसक रहा है सृष्टि
डांवाडोल रे।
जल थल वायु हुए प्रदूषित बिगड़ा
सकल भूगोल रे।।
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वृक्ष उखड़ते रोज यहाँ फ़रियाद कोई
ना सुनता है !
ओ रे ! मानव तू खुद अपने पैर
कुल्हाड़ी बुनता है !!
राज्य --राजस्थान !
सम्पर्क-9116488506
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गीत (प्रकृति की व्यथा)
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परिमंडल अब सिसक रहा है सृष्टि
डांवाडोल रे।
जल थल वायु हुए प्रदूषित बिगड़ा
सकल भूगोल रे।।
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वृक्ष उखड़ते रोज यहाँ फ़रियाद कोई
ना सुनता है !
ओ रे ! मानव तू खुद अपने पैर
कुल्हाड़ी बुनता है !!
फल और छाया देने वाले तरुवर शाप
लगाते है!
प्रलय काल अब आया इंसा रोकर तुझे
जगाते है!!
लगाते है!
प्रलय काल अब आया इंसा रोकर तुझे
जगाते है!!
ऑजों परत मंडराता खतरा अब तो
आँखे खोल रे।
जल थल वायु हुए प्रदूषित बिगड़ा
सकल भूगोल रे।।
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ग्रीन हाउस पर बढ़ता पारा ग्लेशियर
भी पिघल रहा!
ये दोहन विकराल रूप से पर्यावरण को
निगल रहा!!
आँखे खोल रे।
जल थल वायु हुए प्रदूषित बिगड़ा
सकल भूगोल रे।।
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ग्रीन हाउस पर बढ़ता पारा ग्लेशियर
भी पिघल रहा!
ये दोहन विकराल रूप से पर्यावरण को
निगल रहा!!
अंतरिक्ष ब्रह्माण्ड दहलते मानव के
कुकर्मो से!
वृक्ष लगाना बड़ा धर्म है तेरे मेरे
धर्मो से !!
कुकर्मो से!
वृक्ष लगाना बड़ा धर्म है तेरे मेरे
धर्मो से !!
हो रही है दूषित वसुधा चढ़ा गन्दगी
झोल रे।
जल थल वायु हुए प्रदूषित बिगड़ा सब
भूगोल रे।।
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पवन गौतम बृजराही बमूलिया !!
झोल रे।
जल थल वायु हुए प्रदूषित बिगड़ा सब
भूगोल रे।।
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पवन गौतम बृजराही बमूलिया !!

वाकई चिंता जनक स्थिति को अंकित करना कवि का धर्म है वाह
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